कोल प्रोजेक्ट विरोध: क्या शौक के आगे झुक रही किसानों की ज़मीन?
रायगढ़ — धरमजयगढ़ विधानसभा क्षेत्र में किसानों और युवाओं के बीच ज़मीन को लेकर सोच में बड़ा बदलाव देखा जा रहा है। हाल ही में विधायक लालजीत राठिया का एक वीडियो सोशल मीडिया पर चर्चा में है, जिसमें उन्होंने किसानों से भावनात्मक अपील करते हुए कहा कि वे अपने बच्चों को खेतों में साथ लेकर जाएँ, ताकि उनमें अपनी मिट्टी के प्रति लगाव बना रहे और वे बाइक-कार जैसे शौक पूरे करने के लिए अपनी ज़मीन कंपनियों को न बेचें। यह बयान ऐसे समय में सामने आया है जब क्षेत्र में अदानी समूह सहित कई कंपनियाँ बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण कर रही हैं। गाँवों में किसानों से ज़मीन खरीदी की प्रक्रिया तेज़ हो चुकी है। कई किसान इस बात से चिंतित हैं कि तत्काल लाभ के लालच में वे अपनी पीढ़ियों की पूँजी गँवा सकते हैं, वहीं कई युवा इसे “आधुनिक जीवन की शुरुआत” मान रहे हैं।
🌾 युवाओं में घटता खेती का आकर्षण और बढ़ती शहरी सोच
धरमजयगढ़, सरगुजा और कोरबा क्षेत्र में अब गाँव के युवाओं में खेती-बाड़ी के प्रति रुचि कम होती जा रही है। सोशल मीडिया और शहरों की चमक ने उनकी सोच में बड़ा परिवर्तन ला दिया है। अब किसान का बेटा खेत में काम करने को पिछड़ापन समझता है और मोटरसाइकिल, मोबाइल, फैशनेबल कपड़े जैसे प्रतीकों को सफलता का मानक मानने लगा है। समाजशास्त्री डॉ. एम.एस. त्रिवेदी बताते हैं कि युवाओं की यह मानसिकता उन्हें अपनी जड़ों से काट रही है। वे ज़मीन बेचकर शहर में कुछ बड़ा करने का सपना देखते हैं, लेकिन वास्तविकता में न तो उन्हें स्थायी रोजगार मिलता है, न ही वही सम्मान जो खेती से जुड़ी ज़िंदगी में था। स्थानीय किसान भी मानते हैं कि एक बार ज़मीन हाथ से निकल गई तो फिर लौटकर नहीं आती — “हमारे बाप-दादा ने ज़मीन बचाई, हमने बेच दी, अब बच्चों के पास क्या रहेगा?”
🏭 विकास के झूठे सपनों में पीछे छूटता जल-जंगल-जमीन का नारा
धरमजयगढ़ में अदानी समूह और अन्य औद्योगिक कंपनियाँ कोयला खनन व प्रोजेक्ट्स के लिए ज़मीन खरीदने में सक्रिय हैं। किसानों का कहना है कि उन्हें बाज़ार भाव से कम मुआवज़ा मिल रहा है, जबकि बिचौलिये उन्हें उज्ज्वल भविष्य का सपना दिखा रहे हैं। इसी पृष्ठभूमि में विधायक लालजीत राठिया की अपील सामाजिक चेतावनी के रूप में उभरी है। उन्होंने कहा — “ज़मीन ही किसान की असली पूँजी है, जब ज़मीन नहीं रहेगी, तो किसान कहाँ रहेगा?” उनका यह संदेश केवल राजनीतिक बयान नहीं बल्कि ग्रामीण आत्मनिर्भरता को बचाने की पुकार है। विशेषज्ञों का भी कहना है कि तात्कालिक लाभ की यह प्रवृत्ति लंबे समय में गाँव की पहचान और अर्थव्यवस्था दोनों को खोखला कर देगी। धरमजयगढ़ की यह स्थिति आज पूरे देश के ग्रामीण समाज का प्रतिबिंब बनती जा रही है, जहाँ मिट्टी से मोह कम और बाज़ार से रिश्ता गहरा होता जा रहा है।


