छत्तीसगढ़ की धरती सिर्फ़ खनिज से नहीं, बल्कि संघर्ष और आत्मसम्मान से भी पहचानी जाती है। रायगढ़ ज़िले के गारे–पेलमा गाँव हर साल 2 अक्टूबर को गांधी जयंती के दिन एक अनोखे आंदोलन का गवाह बनता है—कोयला सत्याग्रह। यह सिर्फ़ विरोध नहीं, बल्कि आदिवासी–ग्रामीण समाज की आवाज़ है जो यह कहता है:

“हमारी ज़मीन! हमारा कोयला!”

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क्यों शुरू हुआ कोयला सत्याग्रह?

गांधीजी के नमक सत्याग्रह से प्रेरित यह आंदोलन 2010 के आस–पास शुरू हुआ। जैसे अंग्रेज़ नमक पर हक़ जताते थे, वैसे ही आज बड़ी कंपनियाँ—अदानी समूह और महाराष्ट्र सरकार की बिजली कंपनी महाजेंको—हमारे कोयले पर कब्ज़ा करने निकली हैं।

• हमारी खेतिहर ज़मीन को खदानों में तब्दील किया जा रहा है।

• जंगल काटे जा रहे हैं, जहाँ से हमारी सांसें और आजीविका जुड़ी हैं।

• केलो नदी और जलस्रोत प्रदूषित हो रहे हैं।

और सबसे बड़ा दर्द—ग्राम सभाओं की आवाज़ को ताक़तवर कंपनियों और सरकारों ने दबा दिया है।

कंपनियों का दोहन और अदालत की चेतावनी

गारे पेलमा सेक्टर–II कोल ब्लॉक महाजेंको को दिया गया और खनन का ठेका अदानी की सहयोगी कंपनी को।

• यहाँ 22 मिलियन टन प्रति वर्ष से अधिक कोयला निकाला जाना प्रस्तावित है।

• लेकिन नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने 2024 में साफ़ कहा कि पर्यावरणीय मंज़ूरी गलत तरीके से दी गई थी, ग्राम सभाओं की असली सहमति और स्वास्थ्य पर पड़ने वाले असर को नज़रअंदाज़ किया गया।

• इसके बावजूद पेड़ काटने और खनन की तैयारी तेज़ हो गई—क्या यह लोकतंत्र का अपमान नहीं?

सत्याग्रह का संदेश

हर साल 2 अक्टूबर को ग्रामीण प्रतीकात्मक रूप से कोयला उठाकर नीलामी करते हैं। यह सिर्फ़ रस्म नहीं, बल्कि यह ऐलान है—

• कि हमारी ज़मीन से निकला कोयला पहले हमारे काम आएगा।

• कि बिना ग्राम सभा की अनुमति कोई कंपनी हमारी धरती नहीं छू सकती।

• कि विकास का मतलब सिर्फ़ बिजली घर नहीं, बल्कि हमारी खेती, हमारी नदी और हमारी संस्कृति भी है।

क्यों ज़रूरी है “हमारी ज़मीन, हमारा कोयला”

1. पहचान की लड़ाई – ज़मीन और जंगल सिर्फ़ संपत्ति नहीं, हमारी संस्कृति, हमारी पीढ़ियों की धरोहर हैं।

2. न्याय की लड़ाई – जब बड़ी कंपनियाँ मुनाफ़ा कमाती हैं, तो प्रदूषण, विस्थापन और बीमारी हमारे हिस्से क्यों?

3. भविष्य की लड़ाई – कोयला खत्म होगा, लेकिन तब तक हमारी अगली पीढ़ी बंजर ज़मीन और टूटी परंपरा के साथ कैसे जिएगी?

आगे का रास्ता

गारे–पेलमा का सत्याग्रह सिर्फ़ एक गाँव का नहीं, पूरे छत्तीसगढ़ और देश के ग्रामीण–आदिवासी समाज का संघर्ष है। अब वक्त है कि हम सब मिलकर आवाज़ उठाएँ:

• ग्राम सभाओं की अनुमति के बिना कोई खनन नहीं।

• पर्यावरण और स्वास्थ्य पर असर का पूरा अध्ययन ज़रूरी।

• विकास का मॉडल—स्थानीय लोगों की सहमति और हिस्सेदारी के साथ।

यह सिर्फ़ आंदोलन नहीं, यह हमारी अस्मिता का सवाल है।

आज अगर हम चुप रहे तो कल हमारी ज़मीन और कोयला हमेशा के लिए दूसरों का हो जाएगा। इसलिए आवाज़ उठाइए और कहिए—हमारी ज़मीन! हमारा कोयला!