
कलेक्ट्रेट तक निकाली रैली, जल-जंगल-जमीन बचाने का संकल्प
रायगढ़ जिले के धरमजयगढ़ क्षेत्र में प्रस्तावित अडानी समूह की पुरुंगा कोल ब्लॉक परियोजना के विरोध में मंगलवार को ग्रामीणों ने जोरदार प्रदर्शन किया। तेन्दुमुड़ी, पुरुंगा और साम्हरसिंघा सहित प्रभावित गांवों के सैकड़ों ग्रामीण जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए हाथों में तख्तियां लेकर नारेबाजी करते हुए रैली निकालते हुए रायगढ़ कलेक्टर कार्यालय पहुंचे। कलेक्ट्रेट परिसर में “गेट खोलो, गेट खोलो” के नारों के बीच ग्रामीणों ने जिला प्रशासन से जनसुनवाई रद्द करने की मांग की। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि कोल खदान शुरू होने से उनके खेत, जंगल, पशु और जलस्रोत नष्ट हो जाएंगे। उनका आरोप है कि कंपनी बिना ग्रामसभा की अनुमति और अधूरे वनाधिकार दावों के बावजूद खदान प्रक्रिया को आगे बढ़ा रही है। ग्रामीणों ने कलेक्टर से आग्रह किया कि वे सीधे संवाद कर उनकी आपत्तियों को सुनें और 11 नवंबर को प्रस्तावित जनसुनवाई को तत्काल निरस्त करें।
पेशा कानून के तहत ग्रामसभा ने जताया कड़ा विरोध
धरमजयगढ़ विकासखंड के ग्राम पंचायत तेन्दुमुड़ी में हाल ही में आयोजित विशेष ग्रामसभा में ग्रामीणों ने सर्वसम्मति से मेसर्स अंबुजा सीमेंट्स लिमिटेड (अडानी समूह) की प्रस्तावित पुरुंगा भूमिगत कोल खदान का विरोध करते हुए प्रस्ताव पारित किया। 869.025 हेक्टेयर क्षेत्रफल में फैली इस खदान की उत्पादन क्षमता 2.25 मिलियन टन प्रतिवर्ष प्रस्तावित है, जिसमें 621 हेक्टेयर वन भूमि, 26 हेक्टेयर गैर-वन भूमि और 220 हेक्टेयर निजी भूमि शामिल है। ग्रामीणों ने ग्रामसभा में स्पष्ट किया कि यह क्षेत्र पांचवीं अनुसूची और पेशा कानून 2022 के तहत संरक्षित है, इसलिए बिना ग्रामसभा की स्वीकृति किसी भी परियोजना पर अमल गैरकानूनी होगा। ग्रामवासियों ने चेतावनी दी कि वे अपने जल-जंगल-जमीन के लिए अंत तक संघर्ष करेंगे और किसी भी कीमत पर जनसुनवाई नहीं होने देंगे।
हाथियों का आवास क्षेत्र, खनन से बढ़ेगा संकट
ग्रामसभा द्वारा जारी आपत्तियों में कहा गया कि प्रस्तावित खनन क्षेत्र घने कोकदार आरक्षित वन में आता है, जो हाथियों का प्राकृतिक आवास है। ग्रामीणों ने बताया कि धरमजयगढ़ वनमंडल में अब तक 167 ग्रामीण और 68 हाथी जान गंवा चुके हैं। भूमिगत खनन से बड़े पैमाने पर जलभराव, नदी-नालों के सूखने, ध्वनि व वायु प्रदूषण और हाथियों के विचरण क्षेत्र में बाधा का खतरा है। ग्रामसभा ने प्रशासन और कंपनी को चेताया कि खदान के समर्थन में किसी भी गतिविधि की अनुमति नहीं दी जाएगी। अब निगाहें प्रशासन पर टिकी हैं कि वह पेशा कानून के तहत पारित इस प्रस्ताव का सम्मान करते हुए जनसुनवाई निरस्त करता है या ग्रामीण विरोध के बीच सुनवाई आयोजित करने का जोखिम उठाता है।



