मां बैगिन डोकरी मंदिर की अनूठी परंपरा
लोक संस्कृति और श्रद्धा का अद्भुत संगम

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले के घरघोड़ा में हर साल दशहरे के मौके पर आयोजित होने वाला देवी दरबार श्रद्धा और आस्था का अनूठा संगम बन जाता है। यहां स्थित मां बैगिन डोकरी मंदिर परिसर में दशहरे की सुबह से ही पैर रखने तक की जगह नहीं बचती। सुबह से ही जसगीतों की मधुर धुन और मांदर की थाप से वातावरण गुंजायमान हो उठता है। आदिवासी बैगा समुदाय परंपरा अनुसार चारों दिशाओं में चावल छींटकर देवी-देवताओं को आमंत्रित करता है। इसी बीच भीड़ में कई महिलाओं और पुरुषों पर देवी का आगमन होता है और वे झूमते हुए भक्तों की समस्याएं सुनते और मार्गदर्शन देते हैं। यह नजारा किसी अलौकिक अनुभव से कम नहीं होता, जब भक्तिमय वातावरण में झूमती देवियां और गूंजते जसगीत श्रद्धालुओं को मंत्रमुग्ध कर देते हैं। यहां दशहरे का दिन केवल पर्व ही नहीं बल्कि लोक आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक धरोहर का जीवंत प्रमाण बन जाता है।
मान्यता और इतिहास से जुड़ा है मंदिर
मां बैगिन डोकरी को घरघोड़ा की ग्राम देवी माना जाता है। जनश्रुति है कि देवी चार भांटा गांव की बेटी थीं और विवाह के बाद बैगा परिवार में ससुराल आई थीं। किंतु उनके चमत्कारों को देखकर कुछ लोगों ने उन्हें टोनही कहकर उपहास किया। इससे व्यथित बैग ने देवी को तीन टुकड़ों में काट दिया और वे टुकड़े पत्थर में परिवर्तित हो गए। इसके बाद गांव के पूर्व, मध्य और पश्चिम में मां बैगिन डोकरी के तीन मंदिर स्थापित किए गए। तब से देवी ग्राम की रक्षक शक्ति के रूप में पूजी जाती हैं और उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैली है।
हर साल बढ़ रही है श्रद्धालुओं की भीड़
घरघोड़ा में दशहरे पर सजने वाले इस देवी दरबार में आस्था का ऐसा सैलाब उमड़ता है, जिसे देखने देशभर से श्रद्धालु आते हैं। मां बैगिन डोकरी के दरबार में मनोकामना पूर्ण होने की मान्यता है, इसी वजह से श्रद्धालुओं की संख्या साल दर साल लगातार बढ़ रही है। जसगीत और मांदर की थाप के बीच देवी भक्तों की पीड़ा सुनकर समाधान देती हैं। अलौकिक वातावरण और आदिवासी परंपराओं से जुड़ा यह आयोजन न सिर्फ धार्मिक आस्था का केंद्र है बल्कि लोक संस्कृति की धरोहर के रूप में भी पहचान बना चुका है।
