जगदलपुर। हाल ही में बस्तर संभाग में दर्जनों नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया और सुरक्षा बलों ने बड़ी मात्रा में हथियार बरामद किए। यह अभियान सरकार की ‘लोन वर्राटू’ नीति की सफलता माना जा रहा है। लेकिन ज़मीनी हकीकत बताती है कि प्रशासन की पकड़ अभी भी कमजोर है।

सफलता की तस्वीर
• दर्जनों नक्सली आत्मसमर्पण: कई माओवादी कार्यकर्ता मुख्यधारा से जुड़े।
• हथियार बरामदगी: इंसास राइफल, कारतूस, विस्फोटक समेत भारी मात्रा में सामान पुलिस के हाथ लगा।
• लोन वर्राटू का असर: लगातार आत्मसमर्पण से माओवादियों की पकड़ ढीली होती दिख रही है।
अधूरी तस्वीर
• ग्रामीणों का भरोसा अधूरा: कई गांवों में अब भी नक्सली खौफ कायम है।
• विकास कार्य ठप: सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाएँ नहीं पहुँच पा रही हैं।
• पुलिस की रणनीति पर सवाल: कार्रवाई के बावजूद छोटे समूह जंगलों में सक्रिय हैं और वारदातें कर रहे हैं।
विश्लेषण
नक्सली समर्पण एक बड़ी उपलब्धि है, लेकिन इसे स्थायी बनाने के लिए सिर्फ पुलिस कार्रवाई नहीं, बल्कि विश्वास बहाली, रोजगार, शिक्षा और विकास की बराबर ज़रूरत है। बस्तर की जटिल ज़मीनी हकीकत यही बताती है कि बंदूक से मिली सफलता तभी टिकेगी, जब प्रशासन लोगों की बुनियादी जरूरतें पूरी करेगा।
आत्मसमर्पण की प्रमुख घटनाएँ
• 27 अगस्त 2025 को बीजापुर जिले में 30 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया, जिनमें 20 महिलाओं सहित कई बड़े रैंक वाले नक्सली शामिल थे। इन सभी पर कुल ₹79 लाख से अधिक का इनाम था।
• आत्मसमर्पण करने वालों में कई डीविजनल कमेटी सदस्य, प्लाटून कमांडर, और महिला कैडर शामिल थीं। राज्य सरकार की ‘नियद नेल्लनार’ और नई पुनर्वास नीति से प्रभावित होकर ये नक्सली मुख्यधारा में लौटे हैं।
• 17 अगस्त को गरियाबंद में 4 नक्सलियों ने अपने हथियारों के साथ सरेंडर किया; उनकी गिरफ्तारी का इनाम ₹19 लाख था।
• कोंडागांव में 22 लाख के इनामी नक्सली दंपती समेत 4 नक्सलियों ने समर्पण किया।
• दंतेवाड़ा, नारायणपुर एवं अबूझमाड़ क्षेत्र में भी समूह में आत्मसमर्पण के मामले सामने आए हैं, जहां नक्सली संगठन को छोड़ रहे हैं।
नीचे पाँच वर्षों (2021–2025 तक) में बस्तर क्षेत्र (छत्तीसगढ़) में आत्मसमर्पण की प्रवृत्तियों का संक्षिप्त लेकिन गहन विश्लेषण प्रस्तुत है—ग्राउंड-लेवल पर स्थिति, लंबी अवधि के डेटा और इसके राजनीतिक–सामाजिक मायने:
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पाँछ साल का आत्मसमर्पण आंकड़ों का सारांश
वर्ष आत्मसमर्पण संख्या (लगभग) प्रमुख घटनाएँ और विवेचन
2021 550, 2020 (342) की तुलना में 38% की वृद्धि; हिंसा में कमी, नई सुरक्षा-डेवलपमेंट कैंप्स स्थापित
2022 182 ,आत्मसमर्पणों में गिरावट—संभावित कारण: कड़े ऑपरेशन या रिकॉर्ड-की कमी
2023 187, लगभग स्थिर; विकास तथा सुरक्षा रणनीतियों में पकड़ बनी रही
2024 लगभग 800 (सं: अनुमान) 1,355+ आत्मसमर्पण 2023–2025 की अवधि में—2024 में बड़ा उछाल; बढ़े ऑपरेशन, विकास योजनाएं सक्रिया
2025 (जन–मई) लगभग 537 पहले 5 महीनों में ही तेज़ी; अभियान की गति और सशक्त पुनर्वास नीति ने बढ़ावा दिया
ट्रेंड की व्याख्या:
– आत्मसमर्पण की संख्या 2021 से 2024 तक एकदम बढ़ी, फिर 2025 की शुरुआत में और तेज हुई।
– 2022–23 में मामूली ठहराव रहा, लेकिन ऑपरेशनल और विकास रणनीतियों ने 2024 में इसे टूर्निंग पॉइंट बनाया।
– 2025 की रफ्तार दर्शाती है कि संगठनात्मक और मनोवैज्ञानिक क्षरण जारी है।
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ग्राउंड-लेवल पर घटना-चक्र और प्रशासन की भूमिका
• 24 समर्पण (अप्रैल 2025): वरिष्ठ कमांडर सहित 24 माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया। पुलिस ने इसे कड़ी गर्व स्ट्रैटेजी, सुरक्षा कैंप और कल्याणकारी योजनाओं का सीधा परिणाम बताया ।
• 66 समर्पण (जुलाई 2025): पांच जिलों में 66 नक्सलियों ने हथियार डाल दिए; इनमें कई इनामी थे। पुनर्वास नीति (Poona Margham) की भूमिका अहम रही ।
• सहायता और जानकारी: समर्पित नक्सलियों से मिली terrain-level जानकारी से सुरक्षा बलों को रणनीतिक लाभ मिला—छिपे ठिकानों पर हमला हुआ, अस्थाई शिविर तबाह हुए ।
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और गहरी समझ
1. रणनीति बदलाव का असर:
• 2021–24 में लक्षित सुरक्षा अभियान, मिलावट-पूर्ण विकास (सड़क, स्कूल, कनेक्टिविटी) और सशक्त पुनर्वास योजनाओं से आत्मसमर्पण बढ़ा।
• 2025 में यह रफ्तार और तेज हुई — नीति-संचालन अधिक सुसंगत और प्रभावी साबित हुआ।
2. नेतृत्व और मनोबल का क्षय:
• कप्तान-स्तर पर आत्मसमर्पण और HT-स्तर ने नक्सल संगठन की मनोवैज्ञानिक शक्ति को कमजोर किया।
• Ideological disillusionment, भीतर-उपद्रव और घर-परिवार की चाह ने आत्मसमर्पण बढ़ाया ।
3. अभियानों की सीमा और विरोध:
• कुछ बड़ी घटनाएँ, जैसे Bijapur IED हमले (जनवरी 2025), दर्शाती हैं कि नक्सल अभी भी सक्रिय और खतरनाक बने हुए हैं ।
• Encounter-based (Abujhmarh, Bijapur) कार्रवाई ने भी आत्मसमर्पण की प्रवृत्ति से तालमेल बिठाया है ।
4. पुनर्वास की चुनौतियाँ:
• पुनर्वास नीतियाँ (Poona Margham, Niyad Nella Nar) प्रभावी हैं, लेकिन स्थायी शांति के लिए शिक्षा, रोजगार, आदिवासी संवेदनशीलता पर काम जारी रहना ज़रूरी है।
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निष्कर्ष
पाँछ वर्षों के डेटा और ग्राउंड रियलिटी से स्पष्ट है कि आत्मसमर्पण संख्या में स्थिर और निरंतर वृद्धि हो रही है—विशेष रूप से 2024 और 2025 में। यह दर्शाता है कि प्रशासन की दोहरी रणनीति—सशक्त सुरक्षा अभियान और विकास + पुनर्वास नीतियाँ—प्रभावी साबित हुई हैं।
फिर भी, पूरी बस्तर को मुख्यधारा में लाने के लिए सिर्फ बंदूक छोड़ना पर्याप्त नहीं है। प्रशासन के सामने अगली चुनौती है: देखभाल, दूरदराज में यथार्थ विकास, और स्थानीय लोगों का विश्वास कायम रखना, ताकि आत्मसमर्पण का लाभ स्थायी शांति और समृद्धि में बदल सके।
